मणिपुर के कांगपोकपी जिले से जुड़ी एक गंभीर घटना ने एक बार फिर राज्य में तनाव बढ़ा दिया है। 13 मई को लेइलोन वाइफेई गांव से अपहृत किए गए 6 नागा लोगों के शव 28 दिन बाद बरामद हुए हैं, जिससे पूरे क्षेत्र में आक्रोश फैल गया है। यह घटना ऐसे समय में सामने आई है जब मणिपुर पहले से ही पिछले तीन वर्षों से जातीय हिंसा और अशांति से जूझ रहा है। शवों की बरामदगी के बाद इंफाल वेस्ट में बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए और विरोध प्रदर्शन किया। यूनाइटेड नागा काउंसिल (UNC) ने इस घटना के विरोध में 24 घंटे के बंद का आह्वान किया है। गुरुवार सुबह सभी शवों को कड़ी सुरक्षा के बीच इंफाल स्थित जेएनआईएमएस अस्पताल के मुर्दाघर में लाया गया, जहां भारी भीड़ जमा हो गई। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने आंसू गैस का भी इस्तेमाल किया। नागा संगठनों ने राज्य की डिप्टी सीएम नेमचा किपगेन के खिलाफ भी गंभीर आरोप लगाते हुए उनके इस्तीफे की मांग की है। उनका कहना है कि कुछ राजनीतिक और उग्रवादी संबंधों के कारण सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठते हैं। हालांकि सरकार की ओर से इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है। लियांगमाई नागा समुदाय के नेताओं ने शवों को 28 दिन बाद लाए जाने पर गहरी नाराजगी जताई है और सरकार पर लापरवाही का आरोप लगाया है। परिवार अभी भी शवों की औपचारिक पहचान का इंतजार कर रहे हैं। समुदाय का कहना है कि अंतिम निर्णय पहचान के बाद ही लिया जाएगा। मणिपुर पुलिस के अनुसार, सेना, सीआरपीएफ और असम राइफल्स की संयुक्त टीम ने करीब 24 घंटे की तलाशी के बाद शव बरामद किए। मामले की जांच जारी है। इस घटना की नागालैंड और मेघालय के मुख्यमंत्रियों ने भी निंदा की है।