नागपुर। अमरावती स्थानीय प्राधिकरण निर्वाचन क्षेत्र के विधान परिषद चुनाव में कांग्रेस को बड़ा झटका लगा है। पार्टी उम्मीदवार हर्षजीत देशमुख को एक भी वोट नहीं मिला, जबकि कांग्रेस और उसके महा विकास अघाड़ी (एमवीए) सहयोगियों के पास इस क्षेत्र में 100 से अधिक निर्वाचित प्रतिनिधियों का समर्थन माना जा रहा था। इस अप्रत्याशित नतीजे ने पार्टी के भीतर संगठनात्मक कमजोरी, अनुशासनहीनता और संभावित क्रॉस-वोटिंग को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, कांग्रेस समर्थक वोटों का एक हिस्सा भाजपा उम्मीदवार प्रवीण पोटे पाटिल या वंचित बहुजन अघाड़ी के उम्मीदवार नीलेश विश्वकर्मा के पक्ष में चला गया हो सकता है। इससे विपक्षी खेमे में सुनियोजित क्रॉस-वोटिंग की चर्चाएं तेज हो गई हैं। यह परिणाम 2018 के चुनाव से बिल्कुल अलग रहा, जब आंतरिक मतभेदों के बावजूद कांग्रेस 17 वोट हासिल करने में सफल रही थी। सूत्रों के मुताबिक, मूल उम्मीदवार के अंतिम समय में चुनाव मैदान से हटने के बाद पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच भ्रम की स्थिति बन गई थी। बाद में कांग्रेस ने अपने सदस्यों को वोट न देने का व्हिप जारी किया, लेकिन नतीजों से संकेत मिले कि कई प्रतिनिधियों ने पार्टी निर्देशों का पालन नहीं किया। चुनाव के दौरान छह वोट अमान्य घोषित किए गए, जिनमें एक मतपत्र पर गलत निशान था और पांच मतपत्र खाली पाए गए। इससे जानबूझकर वोट खराब करने और अंदरूनी असंतोष की अटकलों को और बल मिला। पूर्व मेयर मिलिंद चिमोटे ने कहा कि यह चुनाव स्थानीय राजनीति में धनबल और प्रभाव के बढ़ते असर को दर्शाता है। वहीं, कांग्रेस महासचिव किशोर बोरकर ने चुनाव प्रबंधन में शामिल नेताओं पर हार की जिम्मेदारी डालते हुए संगठनात्मक विफलता को इस शर्मनाक नतीजे का मुख्य कारण बताया। कुल मिलाकर, अमरावती का यह परिणाम कांग्रेस के लिए आत्ममंथन का विषय बन गया है।